गुरुवार, 5 जनवरी 2012

ज़िंदगी अपनी हो रही जो ग़म में बसर है

ज़िंदगी अपनी हो रही जो ग़म में बसर है
कुछ तो किस्मत कुछ तेरी आहों का असर है।

कटती नहीं शब तेरे आगोश के बिना
लगता है जैसे बड़ी दूर सहर है।

कब्र पे आकर वादा वो निभा गए
आज सुर्खियों में बनी ये ख़बर है।

मैं तो लिए बैठा हूं खाली जाम अपना
लेकिन मेरा साकी डाले ना नज़र है।

-हेमंत रिछारिया

बुधवार, 4 जनवरी 2012

श्वानों की लडा़ई


एक बार देखी हमने श्वानों की लडा़ई,
हड्डी एक थी किंतु सबने उस पर नज़र गडा़ई।
एक गुर्राया; दूसरे ने पंजा बढा़या, तीसरा काटने को आतुर,
हड्डी ले भागा वही जो श्वान था सबसे चातुर।

फिर कुछ दिनों के बाद जब चुनाव है आया,
हमारी नज़रों के सामने वही द्रश्य दोहराया,
हमने देखी फिर से वही श्वानों की लडा़ई,
हड्डी एक थी किंतु सबने उस पर नज़र गड़ाई,
सुना था कि अपने क्षेत्र में "श्वान" भी "सिंह" होता है,
ये कैसा माहौल है यारों जहां "सिंह"; "श्वान" होता है..!

कवि-हेमंत रिछारिया

रविवार, 1 जनवरी 2012

मंगलवार, 16 मार्च 2010

भारतीय नववर्ष

वर्ष प्रतिपदा या गुड़ी पड़वाँ का पर्व हम सभी भारतवासियोँ के लिए गर्व का विषय है लेकिन खेद के साथ कहना पड़ता है कि हमारे द्वारा पश्चिम के अन्धानुकरण के कारण इस पर्व से जुड़े धार्मिक , सामाजिक , ऐतिहासिक और राष्ट्रीय महत्व से नई पीढ़ी अवगत नहीँ है । आइये ! आज इस अवसर पर कुछ महत्वपूर्ण तथ्योँ का हम स्मरण करेँ ।
1 - इस दिन ॐकार के ब्रह्मनाद के निरूपण के साथ जगत्पिता ब्रह्माजी ने इस सृष्टि की रचना की थी ।
2 - विश्व की सर्वाधिक प्राचीन एवं विज्ञान सम्मत कालगणना इसी दिन से आरम्भ हुई थी।
3 - शक्ति की उपासना के पर्व ' चैत्रीय नवरात्र ' का यह प्रथम दिन है ।
4 - इस दिन भगवान श्रीराम के राज्याभिषेक के साथ ही भारतवर्ष मेँ रामराज्य की स्थापना हुई थी ।
5 - धर्मराज युधिष्ठिर का राजतिलक भी आज ही के दिन हुआ था ।
6 - आज से 2066 वर्ष पूर्व सम्राट विक्रमादित्य ने आक्रमणकारी शकोँ को पराजित करने के बाद विक्रम सम्वत प्रारम्म किया था ।
7 - आज के ही दिन वरुणावतार भगवान श्री झूलेलाल जी का इस धराधाम पर अवतरण हुआ था ।
8 - सिक्ख पंथ के द्वितीय गुरु अंगद देव जी का जन्म भी आज ही के दिन हुआ था ।
9 - महर्षि दयानन्द सरस्वती जी ने आज के ही दिन आर्य समाज की स्थापना की थी ।
10 - उत्तर भारत के महान हिन्दू योद्धा हेमचन्द्र विक्रमादित्य ने मुग़ल बादशाह अक़बर पर ऐतिहासिक विजय प्राप्त की थी ।
11 - राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक आद्य सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी का जन्म भी आज ही के दिन हुआ था ।
ऐसे महान पर्व पर सभी सुधी पाठकोँ , मित्रोँ , शुभ - चिन्तकोँ , परिजन एवं पुरजन को अनेकानेक शुभ - कामनाएँ एवं हार्दिक बधाई ।
- रमेश दीक्षित , टिमरनी

मंगलवार, 9 मार्च 2010

मेरे दोहे अनुभूति पर


निकले थे घर से कभी, हम सपनों के साथ
इक-इक करके राह में, सबने छोडा हाथ

प्यारी दैरो-हरम से, तेरी ये दहलीज़
मैंने तेरे नाम का, डाल लिया ताबीज़

रखने की गुलदान में,मत करना तुम भूल
नहीं महक सकते कभी, कागज़ के ये फूल

अब ये देखें बीच में, कौन हमारे आय
हम तो बैठे हैं यार, तुझको खुदा बनाय

रोके से रुकता नहीं, करता मन की बात
हम लाचार खड़े रहें, मन की ऐसी जात

कल मुझसे टकरा गई, इक नखराली नार
अधर पांखुरी फूल की, चितवन तेज कटार

तुमने छेड़ा प्यार का, ऐसा राग हुज़ूर
सदियों तक बजता रहा, दिल का ये संतूर

देखो ये संसार है, या कि भरा बाज़ार
संबंधों के नाम पर, सभी करें व्यापार

दुई रोटी के वास्ते, छोड़ दिया जब गांव
भरी दुपहरी यार क्यूं, ढूंढ रहे हो छांव

लौट बराती सब चले, अपने-अपने गांव
रुके रहे देहरी पर, रोली वाले पांव

तुमने अपने प्रेम का, डाला रंग;अबीर
घर बारै मैं आपना, होता गया कबीर

सच से होगा सामना, तो होगा परिवाद
बेहतर है कि छोड़ दो, सपनों से संवाद

-हेमंत रिछारिया

सोमवार, 8 मार्च 2010

फिल्म समीक्षा- "पा"


कल सुबह जब देश-दुनिया का हाल जानने के लिये जब अख़बार पर नज़र डाली तो निगाहें बरबस ही एक विग्यापन पर अटक गई। विग्यापन था फिल्म "पा" के बारे में जो शाम ५:३० बजे स्टार-प्लस पर प्रदर्शित होने वाली थी। यदा-कदा ही इस फिल्म के प्रोमो देखकर इतना तो यकीं हो ही गया था कि "पा" एक देखने लायक फिल्म है। पर जब शाम ५:३० बजे चाय की चुस्कियों के बीच जब यह फिल्म देखी तो मन आर.बाल्की;जो इस फिल्म के लेखक और निर्देशक हैं और अभिनय सम्राट अमिताभ बच्चन के प्रति नतमस्तक हो गया। दोनों ने अपने-अपने क्षेत्र में बहुत ही उम्दा काम किया है। गहन संवेदनाओं; संदेशों और भरपूर मनोरंजन से लबरेज़ "पा" नि:संदेह ही सिने जगत की महानतम फिल्मों में से है। जहां तक अमित जी का सवाल है तो उम्र के इस पड़ाव पर १३ साल के बीमार बच्चे का जीवंत अभिनय कर पाना यदि किसी की सामर्थ्य में है तो बस इस महानायक के। भारतीय सिनेमा जगत में सैकड़ों निर्माता-निर्देशक है पर लीक से हटकर स्वस्थ और संदेशात्मक तस्वीर बनाने वाले उंगलियों पर गिने जा सकते हैं। यहां मैं याद करना चाहूंगा फिल्म "ब्लैक" के निर्देशक संजयलीला भंसाली को, और "तारे ज़मीन पर" के लिये आमिर खान को इस प्रकार की फिल्में भारतीय सिने जगत को एक विशिष्टता प्रदान करतीं हैं। कुछ ही निर्माता निर्देशक ऐसे हैं जो व्यवसाय के आधार पर फिल्में ना बनाकर सामाजिक सुधार और सकारात्मक परिवर्तन के लिये फिल्में बनाते हैं। यहां यदि दि-ग्रेट शो मैन राजकपूर साहब को याद नहीं किया जाये तो यह अन्याय होगा। "प्रेम-रोग" जैसी फिल्म के जरिये उन्होने विधवा विवाह का जो संदेश दिया उसे भला कौन भूल सकता है। एक समय था जब ऐसी फिल्में बाक्स-आफिस पर औंधे मुंह गिरा करतीं थी परिणामस्वरूप भविष्य में कोई निर्माता-निर्देशक कबीर की जमात में शामिल होने की हिम्मत नहीं करता था। पर अच्छी बात है कि अब समय बदल रहा है अब ऐसी फिल्मों को दर्शक भी मिल रहे हैं और सम्मान भी लिहाज़ा अब कई निर्माता-निर्देशक इस ओर अपना ध्यान दें रहे हैं। आज समाज को स्वस्थ व अच्छे मनोरंजन की आवश्यकता है। जो उनके विकास में सहभागी हो सके, उनका मार्गदर्शन कर सके। "पा" इसी क्रम की एक बेहतरीन फिल्म है। इसके लिये मैं एक बार पुन: आर.बाल्की और अमिताभ बच्चन जी का ह्रदय से आभारी हूं, और उम्मीद करता हूं कि जल्द ही हमें ऐसी एक और फिल्म देखने को मिलेगी।

-हेमंत रिछारिया

सोमवार, 1 मार्च 2010

ऐसे खेलें फाग


आओ सखि हम तुम मिल खेलें, ऐसे अबके फाग
धो लें सारे द्वेष ह्रदय के, धो लें सारे राग।

लाज का अवगुंठन मुख पर, धरोगे आखिर कब तक
पांव तुम्हारे भी थिरकेंगे, जब छिड़ेंगे मेरे राग।

लाख करो मनुहार भले, बैंया ना छोडूंगा
व्यर्थ बहाने करके तुम, जाती हो जी भाग।

रंगो की बौछार चहुंदिस, अंबर पे लाली छाई
बूंदो का ले रूप झर रहा, नित नूतन अनुराग।

तेरे मेरे अधर मिलें, तो लगता ऐसे
चूम कली को ले उड़ जाए, जैसे भंवर पराग।

यौवन जब रंग में भीगे, कोई कैसे मन समझाए
उलझी अलकें; तिरछी पलकें, आग लगे है आग।

दिनकर चढ़ा मुंडेर, द्वार खड़े हुरियारे
कहे मैया ओ मूढ़मति, अब तो सपनों से जाग।

-हेमन्त रिछारिया