
आओ सखि हम तुम मिल खेलें, ऐसे अबके फाग
धो लें सारे द्वेष ह्रदय के, धो लें सारे राग।
लाज का अवगुंठन मुख पर, धरोगे आखिर कब तक
पांव तुम्हारे भी थिरकेंगे, जब छिड़ेंगे मेरे राग।
लाख करो मनुहार भले, बैंया ना छोडूंगा
व्यर्थ बहाने करके तुम, जाती हो जी भाग।
रंगो की बौछार चहुंदिस, अंबर पे लाली छाई
बूंदो का ले रूप झर रहा, नित नूतन अनुराग।
तेरे मेरे अधर मिलें, तो लगता ऐसे
चूम कली को ले उड़ जाए, जैसे भंवर पराग।
यौवन जब रंग में भीगे, कोई कैसे मन समझाए
उलझी अलकें; तिरछी पलकें, आग लगे है आग।
दिनकर चढ़ा मुंडेर, द्वार खड़े हुरियारे
कहे मैया ओ मूढ़मति, अब तो सपनों से जाग।
-हेमन्त रिछारिया
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