नेह ने देह में सेंध दई
अंखियान को रंग अबीरी भयो,
तन तो तन है मन की का कहैं
असरीरी हू थो सो सरीरी भयो,
गहि गैल में चूम लियो नंदलाल ने
हाय वह वहरीरी भयो,
सब चाखन कूं लालच फिरें
जैसे गोरी को गाल पंजीरी भयो।
-आत्मप्रकाश शुक्ल
कविता
इसीलिए तो होली हंसती आज है
इसी ठिठोली में फागुन की लाज है,
इसकी लाली में खिलता श्रंगार है
मलो अबीर गुलाल तुम्हे तो अधिकार है।
आओ आज प्यार कर लें फिर प्यार को
इसी रंग में रंग दें सब संसार को।
-शिवमंगल सिंह "सुमन"
***
सोमवार, 1 मार्च 2010
फागुन आया गांव
होली के दोहे
दहकी दहकी दोपहर बहकी-बहकी रात।
फागुन आया गांव में लेकर ये सौगात॥
है चंदन के लेप सी ये सीने की आंच।
सखि पाती बिन बैन के नैन मूंदकर बांच॥
खनक उठे हैं लाज के बागी बाजूबंद।
संयम के हर छंद को होने दो स्वछंद॥
-शिवओम अम्बर
बरस नया ले आ गया, रंगो का त्यौहार।
चटक-मटक गोरी फिरे, पिय करे मनुहार॥
केशर से रंगी बदन, कस्तूरी सी रात।
पायल बिछ्वे कर रहे, चुपके-चुपके बात॥
यह यायावर ज़िंदगी, चलते-चलते पांव।
भर पिचकारी मार दे, आए तेरे गांव॥
दहक रहा टेसू खड़ा, घूंघट में है पीर।
बंधन सारे तोड़कर, गोरी हुई अधीर॥
कजरारे नयना हंसे, गाल बने गुलाब।
रंग गुलाबी मन हुआ, मिलने को बेताब॥
-प्रेमचंद सोनवाने
कीचड़ उसके पास था मेरे पास गुलाल।
जो था जिसके पास में उसने दिया उछाल॥
-माणिक वर्मा
होली आई गांव में गई गांव की नींद।
आंखों में सौदे हुए होंठों कटी रसीद॥
-कैलाश गौतम
दहकी दहकी दोपहर बहकी-बहकी रात।
फागुन आया गांव में लेकर ये सौगात॥
है चंदन के लेप सी ये सीने की आंच।
सखि पाती बिन बैन के नैन मूंदकर बांच॥
खनक उठे हैं लाज के बागी बाजूबंद।
संयम के हर छंद को होने दो स्वछंद॥
-शिवओम अम्बर
बरस नया ले आ गया, रंगो का त्यौहार।
चटक-मटक गोरी फिरे, पिय करे मनुहार॥
केशर से रंगी बदन, कस्तूरी सी रात।
पायल बिछ्वे कर रहे, चुपके-चुपके बात॥
यह यायावर ज़िंदगी, चलते-चलते पांव।
भर पिचकारी मार दे, आए तेरे गांव॥
दहक रहा टेसू खड़ा, घूंघट में है पीर।
बंधन सारे तोड़कर, गोरी हुई अधीर॥
कजरारे नयना हंसे, गाल बने गुलाब।
रंग गुलाबी मन हुआ, मिलने को बेताब॥
-प्रेमचंद सोनवाने
कीचड़ उसके पास था मेरे पास गुलाल।
जो था जिसके पास में उसने दिया उछाल॥
-माणिक वर्मा
होली आई गांव में गई गांव की नींद।
आंखों में सौदे हुए होंठों कटी रसीद॥
-कैलाश गौतम
ग़ज़ल
अधरों पर शब्दों को लिखकर मन के भेद न खोलो
मैं आंखो से सुन सकता हूं तुम आंखो से बोलो
फिर करना निष्पक्ष विवेचन मेरे गुण-दोषों का
पहले मन के कलुश नयन के गंगाजल में धो लो
संबंधों की असिधारा पर चलना बहुत कठिन है
पग धरने से पहले अपने विश्वासों को तौलो
स्नेह-रहित जीवन का कोई अर्थ नहीं है
मेरे मीत न बन पाओ तो और किसी के हो लो
जीवन मरूथल में तरूछाया ढूंढे नहीं मिलेगी
तप्त धरा को मां का शीतल अंश समझकर सो लो
"गोविंद" वाणी-बाण ह्रदय को छ्लनी कर देते हैं
सत्य बहुत कड़्वा होता है सोच-समझकर बोलो
-गोविंदाचार्य "निशात"
मैं आंखो से सुन सकता हूं तुम आंखो से बोलो
फिर करना निष्पक्ष विवेचन मेरे गुण-दोषों का
पहले मन के कलुश नयन के गंगाजल में धो लो
संबंधों की असिधारा पर चलना बहुत कठिन है
पग धरने से पहले अपने विश्वासों को तौलो
स्नेह-रहित जीवन का कोई अर्थ नहीं है
मेरे मीत न बन पाओ तो और किसी के हो लो
जीवन मरूथल में तरूछाया ढूंढे नहीं मिलेगी
तप्त धरा को मां का शीतल अंश समझकर सो लो
"गोविंद" वाणी-बाण ह्रदय को छ्लनी कर देते हैं
सत्य बहुत कड़्वा होता है सोच-समझकर बोलो
-गोविंदाचार्य "निशात"
प्यार की स्मारिका
सर किसी का आज कांधे पर टिका है
ज़िंदगी कल शत्रु थी अब प्रेमिका है
आइये, चढ़कर यहां से चांद छू लें,
आज मन मेरा हुआ अट्टालिका है
तरबतर है आज सांसे खुशबुओं से
और घर जैसे महकती वाटिका है
स्वप्न जैसे हो गए मुरली मनोहर
आंख जैसे हो गई अब राधिका है
देख लेना और फिर नज़रे चुराना
अंकुराते प्यार की यह भूमिका है
नींद में भी सैर करते हैं गगन की
सुख हमारे नाम ये तुमने लिखा है
ज़िंदगी ने क्या नहीं हमको सिखाया
यूं कहो हम छात्र वह अध्यापिका है
कांच की अलमारियों में बंद रखना
इक घड़ी यह प्यार की स्मारिका है
-दिनेश प्रभात
ज़िंदगी कल शत्रु थी अब प्रेमिका है
आइये, चढ़कर यहां से चांद छू लें,
आज मन मेरा हुआ अट्टालिका है
तरबतर है आज सांसे खुशबुओं से
और घर जैसे महकती वाटिका है
स्वप्न जैसे हो गए मुरली मनोहर
आंख जैसे हो गई अब राधिका है
देख लेना और फिर नज़रे चुराना
अंकुराते प्यार की यह भूमिका है
नींद में भी सैर करते हैं गगन की
सुख हमारे नाम ये तुमने लिखा है
ज़िंदगी ने क्या नहीं हमको सिखाया
यूं कहो हम छात्र वह अध्यापिका है
कांच की अलमारियों में बंद रखना
इक घड़ी यह प्यार की स्मारिका है
-दिनेश प्रभात
पीर सदा बेगानी लिख
मिथ्या जीवन के कागज़ पर, सच्ची कोई कहानी लिख
नीर-क्षीर तो लिख न पाया, पानी को तो पानी लिख
सारी उम्र गुज़ारी यों ही, रिश्तों की तुरपाई में
दिल का रिश्ता सच्चा, बाकी सब बेमानी लिख
अपना घर क्यों रहा अछूता, सावन की बौछारों से
शब्द कोष में शब्द नहीं तो, मौसम की नादानी लिख
हारा जगत दुहाई देकर, ढाई आखर की हर बार
राधा का यदि नाम लिखे तो, मीरा भी दीवानी लिख
इश्क मुहब्बत बहुत लिखा है, लैला-मजनूं; रांझा-हीर
मां की ममता;प्यार बहन का, इन लफ़्ज़ों के मानी लिख
पोथी और कितबों ने तो, अक्सर मन पर बोझ दिया
मन बहलाने के खातिर ही, बच्चे की शैतानी लिख
कोशिश करके देख "आरसी", पोंछ सके तो आंसू पोंछ
बांट सके तो दर्द बांट ले, पीर सदा बेगानी लिख
-आर.सी.शर्मा "आरसी"
नीर-क्षीर तो लिख न पाया, पानी को तो पानी लिख
सारी उम्र गुज़ारी यों ही, रिश्तों की तुरपाई में
दिल का रिश्ता सच्चा, बाकी सब बेमानी लिख
अपना घर क्यों रहा अछूता, सावन की बौछारों से
शब्द कोष में शब्द नहीं तो, मौसम की नादानी लिख
हारा जगत दुहाई देकर, ढाई आखर की हर बार
राधा का यदि नाम लिखे तो, मीरा भी दीवानी लिख
इश्क मुहब्बत बहुत लिखा है, लैला-मजनूं; रांझा-हीर
मां की ममता;प्यार बहन का, इन लफ़्ज़ों के मानी लिख
पोथी और कितबों ने तो, अक्सर मन पर बोझ दिया
मन बहलाने के खातिर ही, बच्चे की शैतानी लिख
कोशिश करके देख "आरसी", पोंछ सके तो आंसू पोंछ
बांट सके तो दर्द बांट ले, पीर सदा बेगानी लिख
-आर.सी.शर्मा "आरसी"
ग़ज़ल
बादल बेसबब इतना नहीं बरस रहा होगा
हो न हो वो दूर कहीं हंस रहा होगा
बूंदो की आहट पे सुर आया है दिल फरेब
कोई कंगन उन कलाइयों में खनक रहा होगा
अब तक ताज़ा है ज़हन में वो मुलाकात की रात
वो भी उस रोज़ का लम्हा-लम्हा पलट रहा होगा
ये हरे दरख़्त जो आज हैं परिन्दो के बसरगाह
पतझड़ भी कभी इन दरख़्तों का सच रहा होगा
मेरा हर लफ़्ज़ लकीर, अहसास स्याही है "आजाद"
चेहरा एक सांवला-सा ग़ज़ल में दिख रहा होगा
-आजाद
हो न हो वो दूर कहीं हंस रहा होगा
बूंदो की आहट पे सुर आया है दिल फरेब
कोई कंगन उन कलाइयों में खनक रहा होगा
अब तक ताज़ा है ज़हन में वो मुलाकात की रात
वो भी उस रोज़ का लम्हा-लम्हा पलट रहा होगा
ये हरे दरख़्त जो आज हैं परिन्दो के बसरगाह
पतझड़ भी कभी इन दरख़्तों का सच रहा होगा
मेरा हर लफ़्ज़ लकीर, अहसास स्याही है "आजाद"
चेहरा एक सांवला-सा ग़ज़ल में दिख रहा होगा
-आजाद
पंजाबी लोकगीत
ਸੁਨ ਵੇ ਫਿਰਂਗਿਯਾਂ ਸਧਰੌਂ ਭੇਰਿਯਾਂ,
ਮੈਂ ਤੇਨੂਆਸ ਸੁਨਾਵਾ|
ਛੁੱਟੀ ਰੇ ਮੇਰੇ ਸੁਰਮੇ ਮਾਹੀ ਨੂ
ਧਾਗਲ ਪਕਡੀ ਪਾਵਾਂ|
हिन्दी-सुन रे फिरंगिया सधरौं भेरियां,
मैं तेनू आस सुनावा।
छुट्टी रे मेरे सुरमे माही नू
धागल पकड़ी पावां
ਖਂਡ ਮਖਨਾ ਰੇ ਪਾਲੇ ਮਾਹੀ ਨੂਂ,
ਕਂਦੀਨੇ ਰਫ੍ਲ ਫਡਾਵਾਂ|
ਫਿਰਂਗਿਯਾ ਤਰਸ ਕਰੋ,
ਤੇਰਾ ਜਸ ਗਿਧੇ ਵਿਚਗਾਵਾਂ|
हिन्दी-खंड मखना रे पाले माही नूं,
कंदीने रफल फड़ावां।
फिरंगिया तरस करो,
तेरा जस गिधे विचगावां।
अर्थ- विरह वेदना से तड़पती हुई विरहनी फिरंगी को लालच देती हुई कहती है कि यदि
तू दया करके मेरे पति को छोड़ दे तो मैं तेरे यश को अपनी सखियों के झुंड में नाच-गाकर सुनाउंगी।
-डा. म्रत्युंजय उपाध्याय
ਮੈਂ ਤੇਨੂਆਸ ਸੁਨਾਵਾ|
ਛੁੱਟੀ ਰੇ ਮੇਰੇ ਸੁਰਮੇ ਮਾਹੀ ਨੂ
ਧਾਗਲ ਪਕਡੀ ਪਾਵਾਂ|
हिन्दी-सुन रे फिरंगिया सधरौं भेरियां,
मैं तेनू आस सुनावा।
छुट्टी रे मेरे सुरमे माही नू
धागल पकड़ी पावां
ਖਂਡ ਮਖਨਾ ਰੇ ਪਾਲੇ ਮਾਹੀ ਨੂਂ,
ਕਂਦੀਨੇ ਰਫ੍ਲ ਫਡਾਵਾਂ|
ਫਿਰਂਗਿਯਾ ਤਰਸ ਕਰੋ,
ਤੇਰਾ ਜਸ ਗਿਧੇ ਵਿਚਗਾਵਾਂ|
हिन्दी-खंड मखना रे पाले माही नूं,
कंदीने रफल फड़ावां।
फिरंगिया तरस करो,
तेरा जस गिधे विचगावां।
अर्थ- विरह वेदना से तड़पती हुई विरहनी फिरंगी को लालच देती हुई कहती है कि यदि
तू दया करके मेरे पति को छोड़ दे तो मैं तेरे यश को अपनी सखियों के झुंड में नाच-गाकर सुनाउंगी।
-डा. म्रत्युंजय उपाध्याय
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